फिर एक बार मरने की सोचता हूँ,
कुछ नया करने की सोचता हूँ,
जो मिल जाए आज साथ किसी का,
तो हद से गुजरने की सोचता हूँ...
भटक रहा हूँ अकेली जान लिए,
एक नन्हा सा दिल परेशान लिए,
कोई खेल ले आज इस खिलोने से,
वक्त भी रुका हो जैसे इम्तेहान लिए.
नर्म सांसों का जो एक सहारा मिल जाए,
जिंदगी की किश्ती को किनारा मिल जाए,
डूब से जाएँ भंवर सी उन् आंखों में हम,
बस एक बार किसी का इशारा मिल जाए...
चकोर जैसे तरसने की सोचता हूँ,
मुहब्बत बनके बरसने की सोचता हूँ,
लोग कहते हैं आग का दरिया जिसे,
उस समुन्दर में उतरने की सोचता हूँ...
फिर एक बार मरने की सोचता हूँ...
कुछ नया करने की सोचता हूँ...
नर हो ना निराश करो मन को ..
-
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न ...
14 years ago
No comments:
Post a Comment