Wednesday, December 17, 2008

Kuch naya karne ki sochta hoon...

फिर एक बार मरने की सोचता हूँ,
कुछ नया करने की सोचता हूँ,
जो मिल जाए आज साथ किसी का,
तो हद से गुजरने की सोचता हूँ...

भटक रहा हूँ अकेली जान लिए,
एक नन्हा सा दिल परेशान लिए,
कोई खेल ले आज इस खिलोने से,
वक्त भी रुका हो जैसे इम्तेहान लिए.

नर्म सांसों का जो एक सहारा मिल जाए,
जिंदगी की किश्ती को किनारा मिल जाए,
डूब से जाएँ भंवर सी उन् आंखों में हम,
बस एक बार किसी का इशारा मिल जाए...

चकोर जैसे तरसने की सोचता हूँ,
मुहब्बत बनके बरसने की सोचता हूँ,
लोग कहते हैं आग का दरिया जिसे,
उस समुन्दर में उतरने की सोचता हूँ...

फिर एक बार मरने की सोचता हूँ...
कुछ नया करने की सोचता हूँ...

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