Monday, February 7, 2011

एक नयी सुबह...

सुबह की किरण जब निकलती है,
ओस की बूँद दरख्तों से मिलती है,
निशा से लड़ के दिया जब बूझता है,
और नन्ही सी कली जब खिलती है.

पंच्छी फडफडा के पंख फैलाते हैं,
खुद को यूं जब नभ में लटकाते हैं,
उड़ने को तो मन मेरा भी करता है,
मंजर कभी जब वो ऐसा दिखाते हैं.

मध्यम सा 'प्रकाश' चेहरे पे पड़ता है,
सौन्दर्य कभी जो श्रृंगार से लड़ता हैं,
दर्पण भी मुझे देख इतराता है, जब
संगमरमर की मूरत कोई जड़ता है.

दूर मंदिर की घंटी जब बजती है,
गुलिस्तां रंग-बिरंगी जब सजती है,
एक कसक सी सीने में उठ-ती है,
दुल्हन जो कोई आईने में संवरती है.

फिरं मैं आज पांव थिरकाना चाहती हूँ,
शर्मो हया तोड़ने का बहाना चाहती हूँ,
चाहती हूँ हर बंधन से आजाद होना,
और खुद से खुद को मिलाना चाहती हूँ.

फिर आज मैं बिखरना चाहती हूँ,
परिंदों जैसे चहकना चाहती हूँ,
बिखर जाऊं खुशबू बन के हवा में,
गुलाब सी बन के महकना चाहती हूँ.

अपने अस्तित्व को साकार चाहती हूँ,
सपनों का सार्थक आकार चाहती हूँ,
चाहत है प्रेम अलंकृत ह्रदय की एक,
और खुशियों भरा संसार चाहती हूँ.