Friday, January 23, 2009

आखिरी याद...

उलझी जिंदगी को सुलझाने चला हूँ,
तेरी आखिरी याद भी भुलाने चला हूँ...

चल पड़ा हूँ अनजान सी एक राह पे,
दम आज भी निकलता है तेरी आह पे...

आंखों में तेरे सपने झिलमिलाते हैं,
जो हकीकत से ना कभी मिल पाते हैं...

बीते लम्हों को भुलाना आसान नही,
उम्र भर कोई किसी का मेहमान नही ...

दो मंजिलों का कभी एक रास्ता नही होता,
अंधेरे का रौशनी से कोई वास्ता नही होता...

दरिया के किनारे कभी मिल पाते नही,
दिल-दिमाग साथ कभी चल पाते नही...

आन्सूओं को अन्तिम बार बहाने चला हूँ,
तेरी 'आखिरी याद' भी अब भुलाने चला हूँ...

Monday, January 5, 2009

अंतिम अभिलाषा...

जीवन की बहुत दुखद परिभाषा है,
जिधर देखूं उधर बस निराशा है...
सपने तो यूँ हैं हजारों आँखों में,
होंगे पुरे कभी बस यही आशा है...

नित्य एक सत्य से सामना होता है,
सांसो को धीरे से थामना होता है...
होती है बदकिस्मती से मुलाकात,
और किस्मत भी आजमाना होता है...

भीड़ में खो जाने का डर साताता है,
फिर भी दिल है कि सपने सजाता है,
द्वंद सा एक रहता है मन-मस्तिस्क में,
और ऐसे में सपना एक खो जाता है...

इस रहस्य को सुलझाने कि जिज्ञासा है,
वो एक अंतर्मन जो जन्मो से प्यासा है,
मृत्युशया पे हो शुन्य ये आत्मा मेरी,
एक आंसू न गिरे, अंतिम अभिलाषा है...

खुश है कौन यहाँ...

बता मुझे कि खुश है कौन यहाँ,
जो भी है थोड़ा, वो है मौन यहाँ...

जिसके पास है सबकुछ वो भी करता कुछ कामना है,
जिसके पास कुछ नही, वो करता जिंदगी का सामना है...

हर एक रिश्ता व्यापर सा लगता है,
दुनिया दुखो का बाजार सा लगता है...

लड़ता हर एक इंसान अपने-आप से है,
मजबूरी की घूँट वो पीता चुप-चाप से है...

उम्मीद हर दुसरे से वो करता है,
पर बतलाने से क्यों वो डरता है...

एक नकली सा मुखौटा हर किसी ने लगा रखा है,
अन्दर से खोखला, चेहरा मुस्कुराता दिखा रखा है...

जूझता
है यहाँ वो अजीब कसम-कश से,
छोटी-छोटी खुशिया निकल गयी वश से...

Friday, January 2, 2009

एक संकल्प ...

नव वर्ष की मधुर बेला में,
इस भागम-दौड़ की मेला में...

अतीत भुला हम भविष्य को देखे ,
क्लेश-द्वेष से परे दृश्य को देखे...

देखे हम एक नवजीवन को ,
स्वक्ष करे हम जड़-चेतन को...

सुधि करे मन -विकार की,
दूत बने मानव-परिवार की...

पर-दुःख को हम अपना समझे,
भोग-विलास को सपना समझे...

कल भी वही था, वही आज है,
मिथ्या में जी रहा समाज है...

कागज के टुकडो में नही है प्यार,
ये तो है बस भावनाओ का व्यापर...

बस करे 'संकल्प' आज हम एक,
अपने-आप में बने इंसान नेक...

सोच बदलने से देश बनेगा,
स्वर्ग हमारा स्वदेश बनेगा...