उलझी जिंदगी को सुलझाने चला हूँ,
तेरी आखिरी याद भी भुलाने चला हूँ...
चल पड़ा हूँ अनजान सी एक राह पे,
दम आज भी निकलता है तेरी आह पे...
आंखों में तेरे सपने झिलमिलाते हैं,
जो हकीकत से ना कभी मिल पाते हैं...
बीते लम्हों को भुलाना आसान नही,
उम्र भर कोई किसी का मेहमान नही ...
दो मंजिलों का कभी एक रास्ता नही होता,
अंधेरे का रौशनी से कोई वास्ता नही होता...
दरिया के किनारे कभी मिल पाते नही,
दिल-दिमाग साथ कभी चल पाते नही...
आन्सूओं को अन्तिम बार बहाने चला हूँ,
तेरी 'आखिरी याद' भी अब भुलाने चला हूँ...
नर हो ना निराश करो मन को ..
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नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न ...
14 years ago