नव वर्ष की मधुर बेला में,
इस भागम-दौड़ की मेला में...
अतीत भुला हम भविष्य को देखे ,
क्लेश-द्वेष से परे दृश्य को देखे...
देखे हम एक नवजीवन को ,
स्वक्ष करे हम जड़-चेतन को...
सुधि करे मन -विकार की,
दूत बने मानव-परिवार की...
पर-दुःख को हम अपना समझे,
भोग-विलास को सपना समझे...
कल भी वही था, वही आज है,
मिथ्या में जी रहा समाज है...
कागज के टुकडो में नही है प्यार,
ये तो है बस भावनाओ का व्यापर...
बस करे 'संकल्प' आज हम एक,
अपने-आप में बने इंसान नेक...
सोच बदलने से देश बनेगा,
स्वर्ग हमारा स्वदेश बनेगा...
नर हो ना निराश करो मन को ..
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नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न ...
14 years ago
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