Friday, March 2, 2012
नर हो ना निराश करो मन को ..
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।
संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।
-- मैथिलीशरण गुप्त
Monday, February 7, 2011
एक नयी सुबह...
ओस की बूँद दरख्तों से मिलती है,
निशा से लड़ के दिया जब बूझता है,
और नन्ही सी कली जब खिलती है.
पंच्छी फडफडा के पंख फैलाते हैं,
खुद को यूं जब नभ में लटकाते हैं,
उड़ने को तो मन मेरा भी करता है,
मंजर कभी जब वो ऐसा दिखाते हैं.
मध्यम सा 'प्रकाश' चेहरे पे पड़ता है,
सौन्दर्य कभी जो श्रृंगार से लड़ता हैं,
दर्पण भी मुझे देख इतराता है, जब
संगमरमर की मूरत कोई जड़ता है.
दूर मंदिर की घंटी जब बजती है,
गुलिस्तां रंग-बिरंगी जब सजती है,
एक कसक सी सीने में उठ-ती है,
दुल्हन जो कोई आईने में संवरती है.
फिरं मैं आज पांव थिरकाना चाहती हूँ,
शर्मो हया तोड़ने का बहाना चाहती हूँ,
चाहती हूँ हर बंधन से आजाद होना,
और खुद से खुद को मिलाना चाहती हूँ.
फिर आज मैं बिखरना चाहती हूँ,
परिंदों जैसे चहकना चाहती हूँ,
बिखर जाऊं खुशबू बन के हवा में,
गुलाब सी बन के महकना चाहती हूँ.
अपने अस्तित्व को साकार चाहती हूँ,
सपनों का सार्थक आकार चाहती हूँ,
चाहत है प्रेम अलंकृत ह्रदय की एक,
और खुशियों भरा संसार चाहती हूँ.
Thursday, December 31, 2009
फिर एक साल जा रहा है...
फिर एक साल जा रहा है,
खट्टी-मीठी याद दिला रहा है,
उमंगो से भरे नए वर्ष को,
हाथ बढ़ा वो बुला रहा है...
इसने कई सपने दिखाए,
कभी हंसाये कभी रुलाये,
दूर किया कभी दोस्तों से ,
कभी अपनों से मिलाये...
नव वर्ष को इसने समझाया,
जीवन का मूल अर्थ बताया,
बिता के कुछ पल उसके साथ,
एक-जुट रहने का एहसास दिलाया...
मेरा-तेरा में उलझा ये संसार है ,
जहाँ टुकडो में बिक रहा प्यार है,
मुखौटा लगा रखा है हर एक चेहरा,
और सच्चाई से सबको इनकार है....
नव वर्ष में खुद से ये वादा करें,
अनुशाशन में रहने का इरादा करें,
कलेश-द्वेष को नयूनतम करके ,
मौद्रिक कम, मानव प्रेम ज्यादा करें...
क्योंकि ....
दिन महीने यूं ही गुजर जाते हैं,
रिश्तों के मायने बदल जाते हैं,
कोई पल में अपना सा लगता है,
और कई दिल से निकल जाते हैं...
Saturday, June 27, 2009
जब कोई शक्श...
जब कोई शक्श हमे याद आता है...
उनका चेहरा आँखों पे छा जाता है...
निहारते हैं जब हम बीते लम्हों को...
मुश्किल से दिल उन्हें भुला पाता है......
सपना एक सुहाना तो टूटना ही था...
अपनों को हमसे तो कभी रूठना ही था...
उमीदों के डोर से बंधी थी ये दामन मेरी...
इस रिश्ते को कभी तो टूटना ही था.....
वक़्त को हमने यूँ निकल जाने दिया...
जिंदगी को जीने के हज़ार बहाने दिया...
मालूम था हमे नतीजा दिल्लगी का...
फिर भी किस्मत को आजमाने दिया.....
जब वो भुलाना चाहेंगे...
गैरों की दामन में यूँ मचलते हुए....
यकीन नहीं होता की ये वही हैं...
जो सहारा लेते थे संभलते हुए...
जिनकी एक आह भी किसी की अमानत थी...
जिनकी एक चाह भी किसी की नियामत थी...
दम निकलता था जिनके एक मुस्कराहट पे...
मन मचलता था जिनके एक शरमाहट पे...
मस्ती जिनकी आंखों में किसी और की थी...
आगोशी जिनकी बाँहों में किसी और की थी ...
अपना सब कुछ लुटाया था जिसने किसी और के लिये....
आखिरी कतरा आंसू का बहाया था कसी और के लिये ....
आज ना जाने वो क्यों इतना इतरा रहे हैं...
अपने जख्मो को क्यों हंसी में छुपा रहे हैं...
जब वो अपना अतीत कभी निहारेंगे...
फूल से चेहरे पे आंसू कभी बिखराएंगे...
जब याद आएगा उनको कोई सख्स ...
तो लडखडाते हुए ना संभल पायेंगे....
Friday, January 23, 2009
आखिरी याद...
तेरी आखिरी याद भी भुलाने चला हूँ...
चल पड़ा हूँ अनजान सी एक राह पे,
दम आज भी निकलता है तेरी आह पे...
आंखों में तेरे सपने झिलमिलाते हैं,
जो हकीकत से ना कभी मिल पाते हैं...
बीते लम्हों को भुलाना आसान नही,
उम्र भर कोई किसी का मेहमान नही ...
दो मंजिलों का कभी एक रास्ता नही होता,
अंधेरे का रौशनी से कोई वास्ता नही होता...
दरिया के किनारे कभी मिल पाते नही,
दिल-दिमाग साथ कभी चल पाते नही...
आन्सूओं को अन्तिम बार बहाने चला हूँ,
तेरी 'आखिरी याद' भी अब भुलाने चला हूँ...
Monday, January 5, 2009
अंतिम अभिलाषा...
जिधर देखूं उधर बस निराशा है...
सपने तो यूँ हैं हजारों आँखों में,
होंगे पुरे कभी बस यही आशा है...
नित्य एक सत्य से सामना होता है,
सांसो को धीरे से थामना होता है...
होती है बदकिस्मती से मुलाकात,
और किस्मत भी आजमाना होता है...
भीड़ में खो जाने का डर साताता है,
फिर भी दिल है कि सपने सजाता है,
द्वंद सा एक रहता है मन-मस्तिस्क में,
और ऐसे में सपना एक खो जाता है...
इस रहस्य को सुलझाने कि जिज्ञासा है,
वो एक अंतर्मन जो जन्मो से प्यासा है,
मृत्युशया पे हो शुन्य ये आत्मा मेरी,
एक आंसू न गिरे, अंतिम अभिलाषा है...