देखा है लोगो को रंग बदलते हुए...
गैरों की दामन में यूँ मचलते हुए....
यकीन नहीं होता की ये वही हैं...
जो सहारा लेते थे संभलते हुए...
जिनकी एक आह भी किसी की अमानत थी...
जिनकी एक चाह भी किसी की नियामत थी...
दम निकलता था जिनके एक मुस्कराहट पे...
मन मचलता था जिनके एक शरमाहट पे...
मस्ती जिनकी आंखों में किसी और की थी...
आगोशी जिनकी बाँहों में किसी और की थी ...
अपना सब कुछ लुटाया था जिसने किसी और के लिये....
आखिरी कतरा आंसू का बहाया था कसी और के लिये ....
आज ना जाने वो क्यों इतना इतरा रहे हैं...
अपने जख्मो को क्यों हंसी में छुपा रहे हैं...
जब वो अपना अतीत कभी निहारेंगे...
फूल से चेहरे पे आंसू कभी बिखराएंगे...
जब याद आएगा उनको कोई सख्स ...
तो लडखडाते हुए ना संभल पायेंगे....
नर हो ना निराश करो मन को ..
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नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न ...
14 years ago
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