Saturday, June 27, 2009

जब कोई शक्श...

जब कोई शक्श हमे याद आता है...

उनका चेहरा आँखों पे छा जाता है...

निहारते हैं जब हम बीते लम्हों को...

मुश्किल से दिल उन्हें भुला पाता है......


सपना एक सुहाना तो टूटना ही था...

अपनों को हमसे तो कभी रूठना ही था...

उमीदों के डोर से बंधी थी ये दामन मेरी...

इस रिश्ते को कभी तो टूटना ही था.....


वक़्त को हमने यूँ निकल जाने दिया...

जिंदगी को जीने के हज़ार बहाने दिया...

मालूम था हमे नतीजा दिल्लगी का...

फिर भी किस्मत को आजमाने दिया.....


जब वो भुलाना चाहेंगे...

देखा है लोगो को रंग बदलते हुए...
गैरों की दामन में यूँ मचलते हुए....
यकीन नहीं होता की ये वही हैं...
जो सहारा लेते थे संभलते हुए...

जिनकी एक आह भी किसी की अमानत थी...
जिनकी एक चाह भी किसी की नियामत थी...

दम निकलता था जिनके एक मुस्कराहट पे...
मन मचलता था जिनके एक शरमाहट पे...

मस्ती जिनकी आंखों में किसी और की थी...
आगोशी जिनकी बाँहों में किसी और की थी ...

अपना सब कुछ लुटाया था जिसने किसी और के लिये....
आखिरी कतरा आंसू का बहाया था कसी और के लिये ....

आज ना जाने वो क्यों इतना इतरा रहे हैं...
अपने जख्मो को क्यों हंसी में छुपा रहे हैं...

जब वो अपना अतीत कभी निहारेंगे...
फूल से चेहरे पे आंसू कभी बिखराएंगे...
जब याद आएगा उनको कोई सख्स ...
तो लडखडाते हुए ना संभल पायेंगे....