फिर एक साल जा रहा है,
खट्टी-मीठी याद दिला रहा है,
उमंगो से भरे नए वर्ष को,
हाथ बढ़ा वो बुला रहा है...
इसने कई सपने दिखाए,
कभी हंसाये कभी रुलाये,
दूर किया कभी दोस्तों से ,
कभी अपनों से मिलाये...
नव वर्ष को इसने समझाया,
जीवन का मूल अर्थ बताया,
बिता के कुछ पल उसके साथ,
एक-जुट रहने का एहसास दिलाया...
मेरा-तेरा में उलझा ये संसार है ,
जहाँ टुकडो में बिक रहा प्यार है,
मुखौटा लगा रखा है हर एक चेहरा,
और सच्चाई से सबको इनकार है....
नव वर्ष में खुद से ये वादा करें,
अनुशाशन में रहने का इरादा करें,
कलेश-द्वेष को नयूनतम करके ,
मौद्रिक कम, मानव प्रेम ज्यादा करें...
क्योंकि ....
दिन महीने यूं ही गुजर जाते हैं,
रिश्तों के मायने बदल जाते हैं,
कोई पल में अपना सा लगता है,
और कई दिल से निकल जाते हैं...