Monday, January 5, 2009

अंतिम अभिलाषा...

जीवन की बहुत दुखद परिभाषा है,
जिधर देखूं उधर बस निराशा है...
सपने तो यूँ हैं हजारों आँखों में,
होंगे पुरे कभी बस यही आशा है...

नित्य एक सत्य से सामना होता है,
सांसो को धीरे से थामना होता है...
होती है बदकिस्मती से मुलाकात,
और किस्मत भी आजमाना होता है...

भीड़ में खो जाने का डर साताता है,
फिर भी दिल है कि सपने सजाता है,
द्वंद सा एक रहता है मन-मस्तिस्क में,
और ऐसे में सपना एक खो जाता है...

इस रहस्य को सुलझाने कि जिज्ञासा है,
वो एक अंतर्मन जो जन्मो से प्यासा है,
मृत्युशया पे हो शुन्य ये आत्मा मेरी,
एक आंसू न गिरे, अंतिम अभिलाषा है...

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